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आज  है  मंगल   बेला आई,
शोभा अवध बरन नहिं जाई।
मंगल   भवन  अमंगल  हारी ,
सबके हिय में अवधबिहारी ।

देवदुंदुभी   बज  रहे नभ में,
कर रहे  देवगण  मंगलगान।
करें देव  स्तुति नभ में; छेड़ें,
नारद  तुंबरु  वीणा  पर तान।


पुष्पवृष्टि  हो  रही है  नभ से,
बह रही मंद पवन अति शीतल।
मंगलमय वृष्टि होवे  अवध पर,
हुई  सुगंधित  है यह  धरातल ।

सरयू का तट   सुरम्य हो उठा,
जगमग दीप जले   घर घर में।
बंदनवार  सोवें    हर पथ पर,
खुशियां छायी   हैं  हर घर में ।

आज हो  रही   है  वह शोभा,
जगमग दीप   जले हैं पावन ।
अनुपम है वह दृश्य मन लोभा,
अयोध्या हो   रही मनभावन।

त्रेतायुग का   वह पावन दृश्य ,
जब  लौटे   श्रीराम  लंका से ।
फिर होगा  साकार आज वह,
जब पुनः  अवध   पधारेंगे वे ।
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  ---पेरी सूर्यनारायण मूर्ती "दिवाकर"
(यह मेरी मौलिक रचना है। सर्वाधिकार सुरक्षित।)
(मुखचित्र गूगल से साभार।)