चित्तोड़ के महाराजा राणा साँगा का सबसे छोटा पुत्र 
कुँवर उदय सिंह,उसकी  धाय माँ थी, राणा साँगा के 
पुत्र उदय सिंह को माँ के स्थान पर दूध पिलाने के 
कारण धाय माँ कहलाती थी -
पन्ना का पुत्र चन्दन और उदय सिंह साथ साथ बड़े हुये,उदय सिंह को पन्ना ने अपने पुत्र की तरह पाला था,पन्ना धाय ने उदय सिंह की माँ के स्वर्गवासी होने 
के बाद बालक की परवरिश करने का दायित्व संभाल लिया था,पन्ना पूरी लगन के साथ बालक की परवरिश और सुरक्षा कर रही थी......

महाराज राणा साँगा का भाई पृथ्वी राज, का दासी 
पुत्र बलवीर, चित्तोण का शासक बनना चाह रहा था, 
उसने एक एक करके राणा के वंशजो को मार डाला, 
एक रात बनवीर उदय सिंह को मारने महल की ओर 
चल पड़ा एक विश्वस्त सैनिक के द्वारा पन्ना को सूचना मिल गयी, पन्ना राजवंश के कर्तब्यों के प्रति सजग थी, 
वो उदय सिंह को बचाना चाहते थी, उसने उदय सिंह 
को एक टोकरी में सुला दिया, ऊपर से जूठी पत्तलों से 
ढंक कर एक विश्वस्त सेवक के हाथों महल के बाहर पहुँचवा दिया......

एक विश्वस्त दासी भागती भागती आती है..... 
धाय माँ धाय माँ..... कौन सामली..... धाय माँ ....
कुँवर कहाँ है....? कुवँर जी कहाँ है....? 

क्यों क्या बात है...? कुँवर जी को क्या हुआ....? 

कुँवर जी का जीवन संकट में है, उनका जीवन 
बचाओ धाय माँ....! 

सो रहा है मेरा कुँवर, कहीं तो कुछ नहीं हुआ, 

धाय माँ महाराज की हत्या हो गयी है, वे सो रहे थे 
बलवीर ने मौका पाकर उनके सीने में तलवार भोंक 
दी है, वो कुँवर जी को भी जिन्दा नहीं छोड़ेगा.... 

पन्ना -हाय ऽऽ महाराज..... असमय नाच गाना सुन 
कर मेरे मन में शंका हुयी थी.... इसी कारण मैंने 
कुँवर को जाने से रोक दिया था.... 

है भगवान अब क्या होगा....? बहुत विलासी और अत्याचारी है वो....बल ..वी. र. 

धाय माँ सेविका से कहती हैं सामली तू यहीं ठहर 
मैं अभी आती हूँ.... कुँवर की रक्षा तो हो गयी, 
मैंने कीरत के हाथों उन्हें बाहर भेज दिया है..... 
पर धाय माँ बलवीर से क्या बोलोगी.....? 
मैं अपने बेटे को कुँवर के पलंग पर सुला दूंगी, 
धाय माँ ऐसा मत कहो मैं न सुन सकूंगी.... 
है भवानी माँ मुझे शक्ति देना मैं राजवंश की रक्षा 
के लिए अपना खून दे संकू...... 

तभी चंदन आ जाता है, माँ कुँवर जी कहाँ हैं...? 
भूख लगी है, कुँवर जी सो गये हैं, आज मैं तूझे 
अपने हाथों से खाना खिलाऊँगी.....माँ तू इतनी 
उदास!!क्यों है.....?क्या हुआ है.....? 
कुछ नहीं बेटा... चल !!अब तू सो जा....
आज कुवँर जी के बिस्तर में, कुँवर जी दूसरी 
जगह सो रहे हैं..... चंदन सो जाता है, उसे बहुत 
प्यार करके मुँह तक ढंक कर सुला देती है.... 

बलवीर रक्त रंजित तलवार लिए आता है, पूछता है 
उदय सिंह के बारे में,पन्ना इशारे से ऊँगली दिखाकर 
उदय सिंह के पलंग की तरफ संकेत कर देती है, 
जहाँ पर उसका पुत्र सोया रहता है...बलवीर ने पन्ना 
के पुत्र को उदय सिंह समझकर मार डाला.... 
पन्ना बिचारी आँसू भी न गिरा पायी, अपने पुत्र का 
अपनी आँखो के सामने वध होता हुआ देखती रह गयी, बलवीर के जाने के बाद अपने पुत्र की मृत लाश को चूमकर, राजकुमार को सुरक्षित जगह पर ले जाने के
लिए निकल पड़ी...... 

पुत्र की मृत्यु के बाद पन्ना उदय सिंह को लेकर 
बहुत समय तक शरण पाने भटकती रहती है..... 
बलवीर के डर से उसे कोई पनाह नहीं देता...... 
कुम्भल गढ़ में उसे शरण मिल जाती है..... 
उदय सिंह किले का भांजा होकर बड़ा होता है..... 
13 वर्ष की अल्प आयु में ही वहाँ के लोग......
उदय सिंह को राजा स्वीकार कर लेते हैं और उसका राज्याभिषेक भी कर देते हैं....।
ऐसी ही धन्य है पन्ना धाय, अपने पुत्र का बलिदान 
देकर राजवंश को बचाया...। 

      कहानीकार -रजनी कटारे 
           जबलपुर (म. प्र.)