कुछ हास्य शब्दावली आप सबको... समर्पित
पूर्णता काल्पनिक एवं स्वरचित
आनंद उठाइए 🙏
.श्रीमती जी बहुत देर से चाय में चीनी मिला- मिला कर एक चम्मच से गटर पटर यानी चम्मच घुमा- घुमा कर चीनी और छाछ का मिश्रण कर रही थी । आखिर बीच में मैं बोल ही गया , अरे भाग्यवान समुद्र मंथन गर हो गया हो तो गिलास खाली कर दो वरना इस मंथन से कहीं पहले विष निकल गया तो पीना पड़ेगा ....। .......
.श्रीमती जी बोली अगर विष निकला भी तो प्राणनाथ आपको ही सर्वप्रथम पीना पड़ेगा........ फिर ज्यादा विवाद में ना पढ़कर में चुपचाप घर के बाहर बगीचे में आराम फरमाने लगा , तभी अचानक सामने पड़ोसन जी के दिव्य दर्शन हुए मेरे मन का हास्य रूपी परमाणु लड्डू फूट फूट कर चारों ओर फैलने लगा मानो खुशियां ही खुशियां का अनुभव रूपी धूआ फैलने लगा । . .
. फिर क्या था पड़ोसन ने अपना पहला लब्ज बोला आज कवि महाशय को बाग बगीचे में आज बहुत दिनों में देख रही हूं ........ क्या बात है ना जाने .... में भी आखिर बोल ही गया जहां तितली उड़ेगी तो भंवरा भी पीछे-पीछे आएगा ।
यह सब वार्तालाप मेरी श्रीमती सुन रही थी । में बेफिक्र होकर बिना जाने अपनी धुन में बातें पर बातें किए जा रहा था , कि अचानक पड़ोसन ने चाय पर मुझे बुला लिया । .
मेरे मन का ठिकाना नहीं रहा जैसे ही पड़ोसन ने मुझे गरमा गरम चाय दी मैं केवल उन्हें देख देख कर वह गरम चाय एकदम पी गया ......चाय तो काफी गर्म थी ना अंदर जा रही थी ना बहार थूक सकता था......! कमबखत मेरे गाल और होंठ काफी जल गए । . .
फिर भी मैंने पड़ोसन की गर्म चाय की लाज रख कर अपना आखिर पड़ोसन प्रेम का वास्तविकता में परिचय दे ही दिया । . . .
पड़ोसन तो पड़ोसन थी सब जानती थी .....और तो और...... वह मन ही मन दांतों में उंगली दबा कर ठिलठिलाती जा रही थी , और तो और वह कमबख्त इतनी हंसी कि मेरी श्रीमती को मेरे शक के दायरे में आ कर .... .
...............प्रत्यक्ष हाथों मेरी चाय पीने की करतूत आकर पकड़ ही ली फिर मैं अंदर तो पहले से ही जल रहा था ।
और बाहर से श्रीमती जी गाल, फुला -फुला कर जला रही थी । फिर भी मैं चुपचाप आदर्श पति का आदर्श रिश्ता निभाते हुए धीरे से कहा .......अरे भाग्यवान एक कप चाय तू भी पी ले..... बहुत ही अजीज... वाह टेस्टी मसालेदार... चाय बनी है। . . .
हमारी पड़ोसन की.......चाय तो फिर क्या था । मेरी पड़ोसन ने जाकर वही हल्की सी मंद मंद मुस्कान के साथ जैसे ही चाय लाई मैंने सबसे पहले ट्री मै से चाय उठाकर अपनी पत्नी अपनी श्रीमती के हाथों में सौंप दी .... चाय तो इस बार भी काफी गर्म थी , लेकिन मेरी पड़ोसन भी वह चाय पी रही थी । कि इतनी में। मेरी श्रीमती ने हंसना शुरू कर दिया ... फिर क्या था , मेरी पड़ोसन तो पहले ही हंसी छुपाई थी ...। . .
दोनों ने जब एक साथ ठिलठिलाया तो एक दूसरे की गरम चाय अचानक कमबखत मेरे ही ऊपर गिर गई मन ही मन सोच रहा था .... एक अंदर ही अंदर प्रेम के भाव में जलाती है, तो दूजी बाहर से शक करके जलाती है । लेकिन दोनों जैसी भी है अच्छी है । . .
और लिखूंगा दोस्तों अगर पसंद आए अपनी प्रतिक्रिया देना ....अगर नहीं आए तो कोई बात नहीं..... बस आप सबको राधे-राधे , जय राम जी की... दोस्तों !
आपका अपना
🙏लक्ष्मीनारायण ठाकुर।
देवरी कलां जिला
सागर मध्य प्रदेश से ।

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