मेरा बचपन इक जादू था
जादूगरनी मेरी माँ थी
हर बार दुआ ही निकलती थी
जब -जब वो पलक को झपकती थी।
जब चोट जोर से लगती थी
माँ फूँक मार कर कहती थी
लो ठीक हो गया जल्दी से
फिर झाड़ फूंँक पर आंँचल से
गोदी में लेकर टहलती थी।
नदिया के किनारे चंदा को
आरे-पारे कह बुलाती थी
सोने का कटोरा मंँगाती थी
फिर दूध -भात को चुपके से
मुंँह में घुटक से खिलाती थी।
सुंदर सुंदर कपड़े लाकर
नहला -धुला कर पहनाती थी
नजरें भर कर न अघाती थी
ना नजर किसी की लग जाए
काला टीका भी लगाती थी।
वह आसमान की सैर मुझे
पुलु लुलू कहकर कराती थी
काचर -कूचर कह कर ही वह
दुख रोग सभी को भगाती थी।
हर चीज समय पर हाजिर कर
हैरत में डाल मुझे देती
जादू की नगरी से लाकर
खुशियों का पिटारा भर देती।
मांँ मैं भी जादू सीखूंगी
तेरी ममता की छांँव में
जीवन का हर पल जी लूंँगी
इस जादुई दुनिया को मैं
जन्नत से ऊपर जगह दूंँगी।
मीनू 'सुधा'

1 टिप्पणियाँ