बनी वीरांगना मणिकर्णिका, 
झाँसी की रानी,

माँ का हुआ अन्नंतलोक गमन, 
नाना के घर आई मनु बिठुर, 

बनी वीरांगना मणिकर्णिका, 
झाँसी की रानी, 

बिठुर पेशवा बुलाते छबीली,
प्यार उमड़ा सारा बिटिया पर, 

बनी वीरांगना मणिकर्णिका, 
झाँसी की रानी, 

तीर चलाना करना घुड़ सवारी, 
कार्य उसके वीरता से भरपूर,

बनी वीरांगना मणिकर्णिका, 
झाँसी की रानी, 

पिता मोरोपंत संग बिटिया मनु, 
जाती रहे दरबार बाजीराव के, 

बनी वीरांगना मणिकर्णिका, 
झाँसी की रानी, 

चंचल मन मोहनी मोह लिया, 
बाजीराव बुलायें छैल छबीली, 

बनी वीरांगना मणिकर्णिका, 
झाँसी की रानी, 

पौराणिक वीर गाथाओं का,
आत्ममंथन हृदय में उसके, 

बनी वीरांगना मणिकर्णिका, 
झाँसी की रानी, 

वीर लक्षणा हिय उदात्त गुण,
धनुर्विद्या घुड़सवारी खेल उसके, 

बनी वीरांगना मणिकर्णिका, 
झाँसी की रानी, 

विवाह हुआ गंगाधर राव से, 
नाम रखा गया लक्ष्मी बाई ,

बनी वीरांगना मणिकर्णिका, 
झाँसी की रानी, 

निभायी जिम्मेदारी निलय की, 
रच बस गयीं परिवार में अपने, 

बनी वीरांगना मणिकर्णिका, 
झाँसी की रानी, 

परिवार में थीं स्नेहभाजन, 
आदर सत्कार अपनों का, 

बनी वीरांगना मणिकर्णिका, 
झाँसी की रानी, 

पिता पुत्र दोनों हुये दिवंगत,
निष्प्राण हो गयी लक्ष्मी बाई, 

बनी वीरांगना मणिकर्णिका, 
झाँसी की रानी, 

खोये नहीं संस्कार न आपा, 
न दूर कभी कर्तव्य से अपने, 

बनी वीरांगना मणिकर्णिका, 
झाँसी की रानी, 

पर्दे के अंदर भी रह कर, 
न हुयीं राज काज से विमुख,

बनी वीरांगना मणिकर्णिका, 
झाँसी की रानी, 

दत्तक पुत्र को बाँध पीठ पर, 
खूब लड़ी मर्दानी प्राण तजे, 

बनी वीरांगना मणिकर्णिका, 
झाँसी की रानी ।




        काव्य रचना -रजनी कटारे 
               जबलपुर (म. प्र.)