बहुत ही बातों का
गुम होना अच्छा है
दुनिया का क्या है
कीमत कब समझती
बहुत से सीप और मोती
जा छिपे सागर की गहराई में
बहुमूल्य बन गये
जब ढूंढा गहरे सागर में
आसानी से मिल जाते मोती
फिर कौन पूछता
कीमत तो कोशिश की
ढूंढने की मोतियों को
पुस्तकें कहतीं
माता पिता खुद ईश्वर
हम तलाशते ईश्वर को
मंदिर की इमारतों में
घर की लक्ष्मी की
कद्र कब होती है
जो घर सम्हाल रही
चुपचाप मूक
जब तक घर रही
बेटी को कितना प्रेम किया
ससुराल गयी बेटी पर
क्यों इतना प्यार उमड़ा
घर की बहू भी तो
है सुता के सम
नजदीक है फिर
बेटी न बन पायी
बात एकतरफा नही
दोनों तरफ
सास ससुर को माता पिता
मानती नहीं बहुएं
ननद अगर बहन छोटी है फिर
झूठे मुकदमों में प्रतिवादी क्यों बनती
सलाह मुफ्त में मत देना दोस्तों
मुफ्त सलाह कूड़े में डाली जाती
फिर सच है
छिप जाना बेहतर है
जब तक न तलाशे दुनिया
खुद आपकी प्रतिभा को
रचनाकार : दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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