अक्सर भाईयों के बारे में बहनें लिखती हैं और बेहतरीन लिखती है। अपने भाईयों के प्यार,त्याग, सुरक्षा के बारे में बहुत कुछ लिख जाती हैं कि हम जब पढ़ते हैं तो हृदय भावविभोर हो उठता है। यही हमारी भारतीय संस्कृति भी है कि दूसरे के त्याग व अपनत्व को हमेशा वरीयता दे और निश्चित ही ये हमारे परिवार के बौध्दिक स्तर की व्यापकता को भी दर्शाता है।

       मैं आज राष्ट्रीय भाई दिवस पर अपने भाईयों का जिक्र करना चाहूँगा। आप अगर इसे मेरे भाईयों का महिमा मंडन समझे तो भी समझ सकते हैं क्योंकि भाई मेरे हैं तो मैं तो गुणगान करूँगा ही, इतना तो अधिकार रखता ही हूँ। अपने माँ-बाप की तीन संतानों में हम तीनों ही लड़के हैं,मतलब कोई सगी बहन नहीं है हमारी। बड़े भाईया हमेशा से ही बड़े ही मिले हमें। मतलब 7-8 साल की उम्र में ही वो बड़े हो गये थे। हम दोनों छोटे भाईयों को स्कूल ले जाना,लाना और स्कूल में हमारे लोकल परिवारिजन की भूमिका निभाना ये बड़े भईया ने सहज ही स्वीकार कर लिया था। मेरा मुहँ पकड़कर मेरे बाल काढ़ना, कॉलर के बटन लगाना और स्कूल की पूरी ड्रेस ठीक करना ये सब भईया करते ही रहते थे और साथ में डाँटते भी रहते थे। हमारी हर समस्या का समाधान बड़े भईया ही होते थे। मुझे अच्छे से याद है कि भईया अपना भी जीवन सवाँरने में लगे थे और जितना हो सकता है, हम पर ध्यान देने में भी लगे थे। कालांतर में जब हम समझदार हुये और अपनी-अपनी पढ़ाई सम्हालने लगे तब भी भईया अपनी भूमिका निभाते रहे।

       फिर मैं पढ़ाई के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने लगा और कानपुर में पुलिस उपनिरीक्षक की दस किलोमीटर की दौड़ के लिये जाना था तब भईया साथ गये। मुझे ध्यान है मैं अन्दर मैदान में दौड़ रहा था और भईया बाहर से मुझे वाह, बहुत बढ़िया, वाह मेरे मिल्खा सिंह, एक चक्कर और, इतने मिनट हो गये कि आवाज लगा रहे थे और प्रतिभागियों के परिवारीजन कभी भईया को चिल्लाते देखते तो कभी मुझे दौड़ते। निश्चित ही भईया का वो उत्साह देना, मेरी गति को और बढ़ा देता। मैं दौड़ में सफल होकर निकला। मेरे भर्ती में जब एक कागज की वजह से दिक्कत आयी तो भईया मेरे साथ इलाहाबाद तक गये कोर्ट मे केस करने, हालाकिं वो बाद में सब ठीक हो गया। फिर मैं चयन पाकर लखनऊ चला आया। भईया मुझे स्टेशन तक छोड़ने आये। आज भी भईया मेरे लिये हर जगह उपलब्ध रहते हैं।

         अब आपको अपने दूसरे भाई के बारे में बताता हूँ। स्वभाव से गुस्सैल और व्यक्तित्व से धनी हैं ये। इन्हें कभी समझ नहीं आया कि मैं बड़ा हूँ या छोटा। परिवार में मझले के साथ ये दिक्कत रहती ही है। ये मेरे लिये एक शांत उत्साह देने वाले का काम करते हैं। ये जो भी करते हैं, दिल से करते हैं। दिमाग का उपयोग तो बहुत बाद में करते हैं। हमारे बीच बॉन्डिंग तो है मगर एक लकीर भी है। जो निश्चित ही होनी भी चाहिये। मेहनती अपार है ये और हम तीनों भाईयों में सबसे आकर्षक भी। छः फीट लम्बाई, गोरा रंग, सुनहरे बाल और वलिष्ठ शरीर। उसी के साथ ठाकुरों वाला रौद्र रूप। अपनी अलग ही पहचान और अलग स्वैग है, इनका।

           मेरे दोनों बड़े भाई मेरे लिये हमेशा प्रेरणादायक ही रहे हैं। कुछ कमियाँ हैं, मगर कौन यहाँ परफेक्ट है? हम तीनों की भी लड़ाइयाँ तभी तक हुई जब तक हम समझदार नहीं थे। आप बच्चों के झगड़े कह सकते हैं उन्हें। जैसे-जैसे हम परिवार के महत्व को समझे, स्वतः ही जुड़ते चले गये। भाई हमारे माँ-बाप से मिली अनमोल निधि होते हैं। भाई हैं जो आपके साथ रहते हैं और हर समस्या में खड़े मिलते हैं। कुछ मतभेद हो सकते हैं, मगर हमें उन्हें भी निभाना चाहिये। क्योंकि वो निस्वार्थ आपके साथ खड़े रहते हैं। भाई ही एक ऐसा व्यक्ति होता है जो आपकी तरक्की देख प्रसन्न होता है, आपकी सफलताओं पर गर्व महसूस करता है। तो निभाते रहिये इस भाईचारे को। कभी अकेलापन महसूस नहीं होगा।

       यहाँ मैं अपने भाई जैसे मित्रों का भी जिक्र करना चाहूँगा जो मेरे लिये हर पल, हर जगह खड़े रहते हैं। ये वो भाई हैं जो मैंनें खुद खोजे हैं, खुद चुने हैं और खुद ही पाये हैं। सच मैं इन भाईयों के बिना जीवन की कल्पना भी बेकार ही है। इन पर मैं गुस्सा कर सकता हूँ, हक से कुछ भी आदेश दे सकता हूँ और ये बस मुस्कुराकर मेरे साथ चल रहे हैं, हमेशा-हमेशा। ईश्वर सबको सुरक्षित रखे और प्यार बनायें रखे।

भावनाओं से ओत-प्रोत
सुमित सिंह पवार "पवार"
उत्तर प्रदेश पुलिस
आगरा