छः महिने पहले जिंदगी की गाड़ी जैसे तैसे पटरी पर आई थी कि फिर से कोरोना फैलने के कारण लॉकडाउन लग गया
और इस बार तो यह रोग बहुत से लोगों की बलि ले रहा है।उसकी बस्ती में ही कितने लोग इसके शिकार हुए थे। राधा के आदमी को,पकंज के माँ बापू को और जोसेफ के जवान को बेटे भी कोरोना खा गया था।
गली-गली फेरी लगाकर प्लास्टिक का सामान बेचने वाला राजू सिर पकड़कर बैठा था।
पिछले साल भी कोरोना ने उसके पेट पर लात मारी थी। तब उसने बड़ी तकलीफों में बसर की थी।उसकी घरवाली बिंदु सिलाई मशीन चलाना जानती थी,तो मोहल्ले की एक सिलाई वाली दीदी के घर मास्क की सिलाई के लिए जाती थी। कुछ उससे पैसा मिला , कुछ उधारी , तो कभी समाजसेवियों की दया से ,तो कुछ सरकार की दया से दो वक्त की रोटी मिली थी। 
पर अब,अब तो बिंदु भी पेट से है। इसलिए आज सुबह राजू ने सोचा कि पास के मोहल्ले में फेरी लगा लेता हूँ,थोड़ी आमदनी हो जाएगी।उसने मास्क लगाया और ठेला लेकर जैसे ही वह आधे रास्ते पहुंचा, मोड़ पर दो पुलिस वालों ने उसे रोक लिया और डंडे से मारते हुए वापस जाने को कहा।राजू माल तो बेच नही पाया,साथ ही डंडों की पिटाई से उसका बदन दुख रहा था। बिंदु ने भी रोते हुए उसे भगवान पर भरोसा रखने को कहा और  समझाया कि जिसने पेट दिया है,वही खाना भी देगा। उसी दर्द और आने वाले कल की चिंता में रात गुजर गई। 
सुबह बिंदु ने राजू को कहा कि ठेला तो अपने पास है ही , तू सब्जी बेचने का धंधा भी तो कर सकता है।चल हम दोनों सारा माल बोरी में डाल देते हैं तो तेरा ठेला खाली हो जाएगा। तू जाकर किसन भैया से मदद मांग,कुछ पैसा मिल जाये तो मंडी से थोड़ी सी सबकी लेकर आ ।हो सकता है धीरे धीरे कमाई होने लगे।बस तू हिम्मत रख ,नहीं तो मेरा ध्यान कौन रखेगा?अपने आंसू आंखों में ही सम्हाले हुए बिंदु ने जब अपने राजू का हौसला बढ़ाया तो राजू  खड़ा हुआ, और चुपचाप ठेले का माल खाली करने लगा,बिंदु भी मुस्कुराते हुए उसकी मदद करने लगी।
थोड़ी कोशिशों से अपने दोस्त से तराजू मांग लाया, पैसे का जुगाड़ कर उसने कुछ सब्जियां खरीदी और निकल पड़ा उन्ही गलियों में नई उम्मीदों के साथ....

✍🏻प्रीति ताम्रकार
       जबलपुर