"नहीं पता मुझे कैसा होता है मां का स्नेह
कैसे मां फिक्र जताती है,
अपने आंचल में छुपा
कैसे प्रेम लुटाती है।
मैंने तो देखा है मां को गर्मी में झुलसकर,
अनाज साफ़ करते हुए।
ठंड में ठिठुरते हुए कपड़े
और बर्तन साफ करते हुए।
भूखे रह कर भी औरों के लिए भोजन बनाते हुए
नहीं देखा मां को कभी मुस्काते हुए।
ना किसी से शिकायत करते हुए।
दूर से ही मैं मां को निहारती रही
नहीं आती पास मां के क्योंकि
मां औरों का गुस्सा हम पर उतारती रही।
देखा मां को जलील होते हुए
दर्द में तो कभी बुखार में रात भर जलते हुए
कभी भूख से कभी बीमारी से पीड़ित होने पर भी
घुटते हुए।
नहीं था समय उसके पास बच्चों की सुधि लेने को
शायद दिल उसका भी रोता होगा।
पर मजबूर और बेवसी में खुद ही तड़पती रही।
नहीं था समय उसके पास
अपने बच्चों को गोद में उठाने का
नाही प्यार या फिक्र जताने का।
बिल्कुल मरनासन्न अवस्था में नाना जी
अक्सर अपने साथ लेकर जाते थे
मां पर बहुत चिल्लाते थे।।
थे वे भी बेबस अपनी ही संतान की हालत
देख नहीं पाते थे।
देखा है मैंने उनकी इस हालत पर
औरों को मुस्काते हुए।
हां किसी के होंठों पर मुस्कान सजाते हुए।
इतना आसान नहीं था जिंदगी उन समयों में,
जब महिला तिल-तिल कर मरती थी
या मार दी जाती थी।।"
अम्बिका झा ✍️

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