सुजान सिंह की तरक्की हवलदार से सूबेदार पद पर हो गयी। साथियों में इज्जत और बढ गयी। वैसे अभी पदोन्नति में समय था। पर एक आतंकी मुठभेड़ में हवलदार सुजान सिंह ने बहुत बहादुरी दिखायी। परिणाम उसकी वर्दी पर कुछ और तमगे और पदोन्नति। कुछ तनख्वाह भी बढी। इस बार छुट्टियों में घर आया तो उसके पास सभी के लिये कुछ न कुछ उपहार था। अम्मा के लिये कश्मीरी शाल, बाबूजी के लिये गर्म कोट, दोनों बच्चों के लिये खिलोने। पर बैग में शोभा के लिये कुछ भी नहीं निकला। शोभा का मन लङने को था। पर अम्मा, बाबूजी की बजह से चुप रह गयी। आदमियों की हमेशा की आदत है कि सब को याद रखेंगे पर घरबाली को भूल जाते हैं।

     खाना बनाते बनाते शोभा के विचारों ने पलटा खाया। अब पदोन्नति हुई है। कुछ तनख्वाह भी बढी है। पर इतनी थोङे ही बढी होगी। अम्मा, बाबूजी के लिये कुछ न लाते तो अच्छा न लगता। बच्चे पहले से ही खिलोनों की फरमाइश कर रहे थे। अब पैसे खत्म हो गये होंगें। मेरा क्या है, कोई बात नहीं। शोभा सब भूल गयी। भारतीय पत्नियां इतनी जल्दी गुस्सा भूल जाती हैं।

     रात में बिस्तर पर शोभा सुजान का इंतजार कर रही थी। शादी को भले ही छह साल हो गये। पर जब भी सुजान छुट्टी पर आता, मिलती उसे नव व्याहता की तरह। आज बच्चों को दादा दादी के कमरें में सुला दिया। चुपके से सुजान ने शोभा की आंखें बंद कर दीं। और शोभा ने जब आंखें खोलीं तो उसकी गोद में एक स्मार्ट फोन रखा था।

    "अरे। यह मेरे लिये लाये हो।"

    "सचमुच तेरे लिये।"

   "पर रहने देते। घर पर वैसे भी बहुत खर्च है। मेरा तो सादा मोवाइल भी ठीक है। अच्छी बात हो जाती है।"

   "बिलकुल बात हो जाती है। पर उससे चिट्ठी तो नहीं भेज सकती।"

" तो क्या इस मोवाइल से चिट्ठी भेज सकते हैं। "

  " बिलकुल। अभी दिखाता हूं। "

   सुजान शोभा को ई मेल और व्हाटसअप दिखाकर सिखाता रहा। शोभा थोङी बहुत पढी भी थी। मोवाइल में हिंदी फोंट डाउनलोड थे। सिखाने में ज्यादा बक्त नहीं लगा।

  " अरे। इससे तो बहुत जल्दी चिट्ठी भेज सकते हैं। "

  " बिलकुल। इधर तूने क्लिक किया। उधर मुझे चिट्ठी मिल गयी। उधर मेने क्लिक किया, तुझे चिट्ठी मिल गयी। और देख फोटो भी भेज सकते हैं। तेरे लिये एक अच्छी सी साङी लेना चाह रहा था। पर पैसे कम पङ गये। अब मोवाइल ज्यादा जरूरी है। और पूरे घर में तू ही इतनी समझदार है कि इसे चला सके। "

    शोभा को अपनी तारीफ कुछ ज्यादा अच्छी लगी। सुजान के गले लग गयी।

...............

  सुजान अपनी ड्यूटी पर आ गया। अब हर रोज वह मोवाइल से शोभा को चिट्ठी लिखता। शोभा भी रोज चिट्ठी लिखती। वैसे बात भी हो जाती। पर बात कितनी देर हो सकती थी। उसमें अम्मा और बाबूजी से भी बात करनी। बच्चे भी पापा से बात को मचल जाते। पर मोवाइल पर चिट्ठी का अलग आनंद था। आराम से फुर्सत में पूरे दिन की दिनचर्या लिखकर ईमेल करती। सुजान भी एक एक बात याद करके लिखता। मोवाइल पर मिली चिट्ठियों को बार बार पढते।इसमें तो भेजी हुई चिट्ठी भी दुबारा पढ सकते हैं। 

शोभा की चिट्ठी 
    " प्राणेश्वर। 

आज बच्चों की फीस भरने स्कूल गयी। मास्टर जी बोल रहे थे कि बच्चे पढने में तो अच्छे हैं, पर शैतानी करते हैं। मेने तो बोल दिया - खूब चपत लगाओ। पर मास्टर जी बोल रहे थे कि अब बच्चों को चपत लगाना मना है। मास्टर की नौकरी चली जाती है। अब यह कौन सी बात हुई। मास्टर बच्चों को पीटेंगें नहीं तो बच्चे तो शैतान बनेंगे। 

     गांव से सुनंदा चाची के घर से शादी का कार्ड आया है। लङकी की शादी है। बाबूजी बोल रहे थे कि कोई साथ का मिल गया तो वो घूम आयेंगें। नहीं तो लङकी के वास्ते पैसे भिजवा देंगें।

     आपकी शोभा "

   सुजान की चिट्ठी 

  " 
   प्रिय शोभा 

यहाॅ अक्सर मोवाइल के सिग्नल चले जाते हैं। सिग्नल जानती है ना। मोवाइल में जो टावर बने आते हैं, वह चले जाते हैं। कल रात से सिग्नल नहीं थे। अब आये हैं। तब तेरी चिट्ठी पढी है। बच्चों की शैतानी की तो वो है कि मै भी बहुत शैतान था बचपन में। उस समय मास्टर पीटते भी बहुत थे। पर इसकी ज्यादा चिंता मत कर। बाबूजी से मैं बोल दूंगा। गांव के लिये ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है। मैं यहीं से मोवाइल से गांव पैसे भेज दूंगा। 

. तुम्हारा सुजान "

शोभा की चिट्ठी 

  " प्राणेश्वर। 

आप मुझे इतना सिखाकर गये। पर मोवाइल से पैसे भेजना नहीं सिखाया। पर मैं भी कम नहीं हूं। हरनाथ चाचा की बेटी है - प्रतीक्षा। उसने सब सिखा दिया मुझे। आप अपनी चिंता रखो। घर तो मैं देखती रहूंगी। बाबूजी को हल्का बुखार आ रहा है। डाक्टर साहब से दबाई दिला दी है। डाक्टर बोल रहे थे कि दो दिन और दबाई दिलानी है। 

आपकी शोभा "

सुजान की चिट्ठी 

" प्रिय शोभा 

बाबूजी का अच्छे से ध्यान रखना। खून का टैस्ट भी करा लेना। अब सर्दी बढ रही है। बच्चों और बूढों पर जल्दी असर करती है। 

यहाॅ तो बहुत सर्दी हो गयी है। शायद वर्फ भी गिरने बाली है। आज दस किलोमीटर पेट्रोलिंग करके आया हूं। सीमा के पार कुछ संदिग्ध लगा। बङे अधिकारियों को खबर कर दी है। उस तरफ से गोली भी चल रहीं हैं। अगर अब तेरी चिट्ठी का जबाब न दे सकूं तो चिंता मत करना। पहले आपनी ड्यूटी फिर घर की चिंता। अब फौजियों का तो यही तरीका है। 

तुम्हारा सुजान। "

शोभा की चिट्ठी 

" प्राणेश्वर 

अच्छी तरह जानती हूं। आप अपनी ड्यूटी करें। मन में थोड़ा डर तो लगता है। पर एक फौजी की पत्नी भी एक अलग ड्यूटी करती है। कई बार अपने दुखों को अपने सीने में छिपाकर परिवार के लिये हसती रहती है। बाबूजी बोल रहे थे कि लल्ला का फोन नहीं आया। मेने बोल दिया कि आया था पर आबाज नहीं आ रही थी। बहुत जल्दी फोन आयेगा।

आपकी शोभा। "

शोभा की चिट्ठी 

" प्राणेश्वर। 
समझ रही हूं। या तो आपके मोवाइल में सिग्नल नहीं आ रहे।अब सिग्नल का मतलब मालूम है मुझको। मोवाइल में जो टावर बने आते हैं, वह नहीं आ रहे। या फिर आपकी ड्यूटी जारी है। कोई बात नहीं। मेने तो इसलिये चिट्ठी लिखी है कि आपको यह न लगे कि मेने चिट्ठी नहीं लिखी। फुर्सत मिलते ही चिट्ठी जरूर लिखना। 

आपकी शोभा। "

  सुजान की फिर चिट्ठी नहीं आयी। आज शोभा अपने मोवाइल से चिट्ठी लिखने बैठी तो एक अनजान की चिट्ठी दिखी। शोभा पढने लगी। 

" आदरणीया श्रीमती सुजान सिंह

मैं फौज का लैफ्टिनेंट फौलाद सिंह हूं। आपके पति श्री सुजान सिंह दुश्मनों से लङते हुए वीरगति को प्राप्त हुए हैं। उन्होंने ही मरने से पूर्व आपका ई मेल हमें दिया। उन्होंने कहा कि आपके परिवार में इतनी साहसी केवल आप ही हैं जिन्हें सूचित किया जा सकता है। एक तो दुश्मन की गोलीबारी, ऊपर से खराब मौसम की बजह से अभी आपके पति के शव को लेकर नहीं आ सकते। आठ दस दिन में सूबेदार सुजान सिंह की मृत देह आप तक मैं खुद पहुंचाऊंगा। 

    हर फौजी की पत्नी की तरह आप भी इतनी बहादुर हो कि आपको समझाने की आवश्यकता नहीं है। 

लैफ्टिनेंट फौलाद सिंह। "

  शोभा इस चिट्ठी को पढ सोच रही है कि अम्मा और बाबूजी को कैसे बताऊं। बच्चों को कैसे समझाऊं। बीच बीच में मोवाइल पर सुजान की चिट्ठियों को पढ रही है। चुपचाप आंखों में आंसू बहा रही है। इस बंद कमरे में आंसू बहाकर शोभा बाहर शांत रहेगी। आखिर आठ दस दिन निकालने हैं। जब तक सुजान सिंह की देह घर न आ जाये। 
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'