"दो घरों को जोड़ने वाली वो औरत कमजोर नहीं।
तूफानों का रुख मोड़े औरत जैसा कोई और नहीं।
करती है सम्मान बड़ों का आदर दिल में वो रखती।
जो संबल है मजबूरों का उस पर ही क्यों गौर नहीं।
शक्ति स्वरूपा हैं काली जगत जननी कहलाती है।
उसे रूलाकर किसी पुरुष को,मिल सकता है ठौर नहीं ।।
घूंघट की मर्यादा में रह कुलवधु कहलाती है।
वक्त पड़े हथियार उठाकर भी चलती कुछ और नहीं।।
बेटी नहीं बेटों से कम जब अपनी आन दिखाती है।
फिर कोई महिषासुर उससे करे युद्ध घनघोर नहीं।
तोड़ पांवों की बेड़ी को भी आसमान मेंं वो उड़ती
पवन उन्मुक्त देख कर, करती कलरव शोर नही।
देखकर सृष्टि के रचयिता उसको खुश हो जाते हैं।
उसकी आखें ना हों तो दुनिया में काजल कोर नहीं।।"
अम्बिका झा ✍️

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