". अरे दीदी। यह तो बहुत कम हैं। मैं तो एक दिन छोड़कर रोज आयी हूं। कितनी बार पुलिस से बचते बचते आयी हू। आपको परेशानी नहीं होने दी। तो दीदी वेतन तो पूरा दे दो।" 

  जब मंदाकिनी ने अपनी मालकिन संध्या से पूरा वेतन देने को बोला तो संध्या का पारा चढ गया। 

  ". पैसा कोई आसमान से नहीं टपकता। दिन भर काम करना होता है तब मिलता है। "

". पर दीदी ।मैं तो कभी नागा नहीं करती। वो तो सरकार ने लाकडाउन लगा दिया। इसी लिये रोज नहीं आ पायी। अनेकों बार पुलिस ने मुझे खदेड़ दिया। अब इसमें मेरा तो दोष नहीं है।" 

  " तो फिर मेरा दोष है क्या। अरे घर का काम हमने किया और पैसे तुम्हें दें। यह तो नहीं होगा। "

  मंदाकिनी चुपचाप वेतन लेकर चल दी। उसके कानों में प्रधानमंत्री जी के शव्द गूंज रहे थे। सभी अपने कामबालो को पूरा वेतन दे। पर वह संध्या से यह बोल नहीं पायी। जानती थी कि वेतन प्रधानमंत्री जी तो दिलाने आयेंगे नहीं।कुछ कहा तो आगे से काम मिलना भी बंद। 

  थोड़ी देर में संध्या का पति सुरेश आ गया। चेहरे पर उदासी थी। 

  " क्या हुआ।" 

.. " कंपनी ने पूरा वेतन नहीं दिया।" 

  " पर ऐसा वह कैसे कर सकते हैं। प्रधानमंत्री जी तो कह रहे हैं कि सभी को कामबालो को पूरा वेतन देना होगा।" 

  फिर दोनों ने बहुत देर मालिकों को कोसा। सरकार ओर प्रधानमंत्री को भी कोसने में कोई कमी न की। आखिर जब उनकी बात कोई मानता नहीं है तो फिर कहते क्यों हैं। 

  संध्या को अभी भी ध्यान नहीं है कि जो काम सुरेश के मालिक ने किया है, कुछ वैसा ही वह भी कर चुकी है।
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'