जो भी चाहा पा लिया तुमने,
फिर जिन्दगी को क्या खाक जिया तुमने।
जमाने भरके खिलौने से खेला बचपन भर,
गर दादी ,बाबा के साथ न खेला तो क्या खेला तुमने।
जमाने भर के बाथ टब , में नहाया तुमने,
गर बारिश में न नहाया तो क्या किया तूने।
उस खाने से पेट भरता है मन नहीं,
जो एक इशारे से ऑनलाइन मंगा लिया तुमने।
आइसक्रीम, कोको कोला, को पीने बाले,
मटके की कुल्फी, कुल्हड़ की चाय को न पिया ,
फिर क्या पिया तूने।
ऑनलाइन, फेसबुक, वाइट्स की खूब बातें,
पर दोस्तों के साथ न कि मस्ती , न वो वेपरवाही भरी ,
शामे न टहली तो क्या टहला तूने।
जमाने भर के इत्र से तुम रहे मुश्क से महके,
गर जबानी के बहते पसीने के इत्र से न महके,
तो क्या किया तुमने।
बड़े ओहदे को पाकर सबको इन्जार कराया,
बैठ कर किसी नदी , पार्क में महबूब की राह को न देखा तो क्या किया तूने।
जमाने भर की मोहब्बत दौलत से नही मिलती,
कभी किसी मासूम कमसिन अल्हड़पन से मिलो,
अगर किसी एक वेश कीमती नजर से दिल बेकरार न किया तो क्या किया तूने।
महंगे लिवास पहनकर महंगी शराब पीकर
खुदको अमीर मत समझो,
नजरों की मय से न पिया तो क्या पिया तुमने।
घूम आए जमाने भर में पर सुकून की तलाश अधूरी ,
न पा सकोगे अगर किसी मंदिर में बैठकर ईश्वर के आगे
न हाले दिल रोया तुमने।
मखमली गद्दे, ब्रांडिड सोफे पर सोकर भी है अधूरे हैं ख़्वाब, सब करार होंगे हाँसिल जो माँ की गोद मे सर रखकर न सोया तुमने।
कभी मिट्टी चूमो अपने गाँव की
किसी और से उम्मीद क्यों ठंडी छाँव की,
जब न कहीं एक सजर बोया तुमने।
अभी बाकी है जिंदगी तो कुछ कर लो बेहतर,
ढलती उम्र फिर न पछतावा करना ,
क्या खोया क्या पाया तुमने।
नफ़रतें फैलाने को बहुत हैं मुजाहिर यहाँ,
प्यार , अमन बाटों तो कुछ ऐसा जो लोग सदियों तक याद करें , क्या कुछ ऐसा किया गोया तुमने।
मालूम था यह शहर ही नही,पत्थरों से बना,
यहाँ के लोग भी है पत्थर के सनम,
फिर क्यों यहां मासूम जज्बों का महल बनाया तुमने।
जो पूरा हो गया पलक झपकते ही,
तो क्या उससे नशीहत पाई,जो तपती धूप,
कड़क सर्दी , तेज बारिश मे चलकर न कुछ पाया तुमने।
अन्जू दीक्षित,
बदायूँ,उत्तर प्रदेश।

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