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प्रेम रोग में बाबरी,। 
खत लिखे दिन रैन,।
पिया को देखत सावरी,। 
छत पर लागत नैन,।।
लत बुरी है प्रेम की,। 
मन में उठता पीर,।।
प्रेम के रंग मैं रची,। 
मन हो गया कबीर।।

                    
      संगीता वर्मा, ✍️✍️