ग़र कर सकूँ समर्पित कुछ बंद उस त्याग की प्रतिमूर्ति को,
जो ग़र परिभाषित कर सकूँ उतरदायित्व की उस कृति को,

मेरी लेखनी आज धन्य हो जाए पितृत्व रचना से अलंकृत होकर...

हर कदम पर अपने संतान के रहनुमा होते हैं पिता,
परिवार की बगिया के बागबान होते हैं पिता..

संपूर्ण जीवन की धरी पूंजी संतान पर न्यौछावर कर देते हैं पिता
कर्ज का आवरण ओढ़े भी बिटिया को विदा कर देते हैं पिता...

विपदा में सतत संघर्ष की आँधियों में हौसलों की दीवार हैं पिता,
पूरे परिवार की अटूट विश्वास, उम्मीद, और आस हैं पिता..

जिंदगी की धूप में बरगद की गहरी छांव होते हैं पिता,
बेटे के लिए राजा तो बेटी के सर का ताज होते हैं पिता..

खुद के अरमानों को परे रख हर फर्ज निभाते हैं पिता,
संस्कार और अनुशासन की बीज संतान में पनपाते हैं पिता...

मेरी शोहरत, मेरा रुतबा, मेरा अभिमान हैं पिता,
उस रब की रहमत, उसका नेमत, उसका वरदान हैं पिता...
सच में मेरे आदर्शों की पहचान, पूरे परिवार की जान हैं पिता...