🌻🌻🌻ॐ,🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
जन्म लेती है जिस दिन बेटी, वो लक्ष्मी कहलाती है, 
त्याग समर्पण की भावना, कूट-कूट भरी जाती है,

एक त्याग की देवी बनकर सारी उम्र बिताती है, 
भावनाओं का गला दबाकर, आगे बढ़ती जाती है,

उसकी खुशियों का भी,एक घरौंदा होता है, 
यह घरौंदा भी आखिर अपना क्यों नहीं होता है, 

अपने जज्बातों का उसके लिए कोई मोल नहीं,
मां बाप की इज्जत से ज्यादा, दूजा भाव अनमोल नहीं,

बचपन से यह सुनती रहती, बेटी  तो पराई  है,
यह तो पराया धन है,किसने यह रीत बनाई है,

आखिर किस्मत में उसकी यह कैसी जुदाई है,
यह जुदाई भी उसने खुशी-खुशी गले लगाई है,

हो चाहे गरीब की बेटी या चाहे धनवान  की,
अपना सर्वस्व त्याग के, हो जाती अनजान की,

अपनी भावनाओं की वह सुध बुध नहीं ले पाती है,
पिता के नाम को छोड़कर, पति के नाम से जुड़ जाती है, 

अपने सारे फर्ज को खुशी-खुशी निभाती है,
असहनीय पीड़ा को सहकर ,परिवार का वंश चलाती है, 

एक माँ बनने के बाद परिवर्तन इतना आता है,
मन भावुक हो जाता उसका, स्वभाव बदल जाता है,

उंगली पकड़कर बच्चे की, उसको चलना सिखाती है
दिन का सुख रातों की नींद बच्चों पर खुशी खुशी लुटाती है,
उसकी एक मुस्कान के कारण वह बच्चा बन जाती है,
तुतला कर वह कभी बोलती, कभी लोरी उसे सुनाती है, 

बच्चों की परवरिश, करते करते आधी उम्र निकल जाती है, जन्म लेती है जिस दिन बेटी, वह लक्ष्मी कहलाती है,

बेटी, बहू ,मां पत्नी बन कर समस्त भूमिका निभाती है, 
यह सच है  इस यात्रा में वह स्वयं को भूल जाती है,

उसके द्वारा की गई समर्पित त्याग की भावनाएं---
केवल एक फर्ज कहलाती है,
जन्म लेती है जिस दिन बेटी वह लक्ष्मी कहलाती है।



संगीता वर्मा✍️✍️