बात करीब चार साल पहले की है ,कुछ दिनों के लिए मायके गई थी अपनी बिटिया को लेकर , जन्म के बाद पहली बार नैनिहाल गई थी मेरी बेटी ,पहला बच्चा हैं तो सब लोग बहुत खुश हैं ,खेल कूद रहें है उसके साथ ,पूरा दिन सब लोग उसी में व्यस्त  रहते हैं ,पता ही नहीं चला कब महीना भर का समय यूँ ही निकल गया ,

ससुराल आने का दिन तय हो गया ,तो पापा बोले अपने और बच्चों के कपड़ें वगैरह ले आती बाजार से , तो मैं अपने छोटे भाई के साथ बाईक से बाजार गई ,सब सामान की ख़रीददारी के बाद दोनों घर वापस आने लगें तो हल्की सी बारिश शुरू हो गई ,

अब अगस्त का महीना हैं ,तो बारिश तो होती ही रहती हैं ,दो दिनों से हो रही थी ,इस वजह से मैं अपने साथ बेटी को नही ले गई थी,

हमारे गांव से बीस किलो मीटर पड़ता हैं शहर ,जहाँ खरीददारी करने जाते हैं, वापसी के समय एक नदी आती हैं ,जिसके ऊपर से पुल पार करके आना पड़ता हैं ,जैसे ही हमारी बाईक उस पुल पर से उतरकर नीचे सड़क की तरफ आई , 

एक तो सड़क गीली होने की वजह से और दूसरा ढलान होने की वजह से बाईक थोड़ी तेज गति से नीचे आई , जिसकी वजह से सड़क पर जगह - जगह हुए गढ्डों में उछलती हुई आई ,और इतने जोर से उछली , 
कि मैं उछलकर धड़ाम से सड़क पर हुए गड्ढे में जा गिरी , 

और तभी एक ट्रक पूरी तेजी से मेरी तरफ आता दिखाई दिया , लगा मुझें कुचल ही देगा ,और मैं जोर से चिल्लाई ,आ पापा मर गई, लेकिन भला हो ट्रक चालक का उसने तुरंत ट्रक को एक तरफ घूमा दिया , और मैं बाल - बाल बच गई ,

 गड्ढे में पानी भी भरा था ,तो सारे कपड़े कीचड़ में हो गए ,मेरा भाई बाईक एक तरफ खड़ा करके आया ,और लोग भी इक्कठा हो गए अपने वाहन रोककर ,बोले ,  बाईक से गिर गई ,उठाओ ,देखो ज्यादा चोट तो नहीं आई , 

मेरे भाई ने हाथ पकड़कर उठाया ,पूछा दीदी ठीक हो ,वो भी घबरा गया था , उठने के बाद पहला शब्द जो मुँह से निकला वो ये था , भाई मेरी बच्ची का क्या होता ,अगर आज मुझें कुछ हो जाता ,तब,
 या फिर अगर आज मैं उसे अपने साथ यहाँ लें आती , तब ,
 भाई बोला ,शांत हो जाओ दीदी , पहले ये बताओ कही दर्द तो नही हो रहा , 
ठीक हूँ भाई ,ज्यादा चोट नही हैं, 
छोटी - मोटी खरोंच हैं ,उसने मेरे हाथ - मुँह धुलवाएं ,फिर हम लोग घर आ गए, घर आकर उसने सब को बताया ,मौत के मुँह से निकलकर आ रही हैं ,और अपनी चिंता नहीं हो रही ,कि  कितनी चोट हैं ,जान बच गई , तब भी बेटी के बारे में सोच रही ,इसका क्या होता ,
माँ हूँ भाई ,ख़ुद से ज्यादा बच्चा प्यारा होता हैं ,तू नही समझेगा , 

आज भी बाईक पर बैठते हुए डर लगता  हैं ,उस दिन की घटना याद आ जाती हैं ,
उस दिन से बाईक पर नही बैठी हूँ ,
बस ईश्वर का धन्यवाद करती हूँ कि मैं अपनी बेटी को नही लें गई ,वरना राम जाने क्या होता ।।
........नेहा धामा " विजेता "