बचपन की अल्हड़ता जाने कहाँ खो गयी ~
लोगों के साजिशों ने हमें
पता नहीं कब  अकेला रहना सीखा दिया ~
जिसे खुद की फिक्र न थी
उसे दूसरों का फिक्र सीखा दिया ~

         लोगों के चेहरे के नकाब ढंके रहे ~
         उनका असली रंग छुपा रहे..
         इसलिए सबों से किनारा कर लिया ~

हम जान गए
दुनिया धुंध में जीना चाहती है ~
जहाँ अक्स फ़िकी हो.. तो ही भाती है ~
हमने अपने मन के उजाले के साथ जीना सीख लिया ~
महफिलों से किनारा कर लिया।

                                
   - ✍डॉ पल्लवी कुमारी"पाम