राग सुनाते भौंरें नैनन की,
सिमट रहा परिवार...
ना डर का कोई भेष बना है,
बदला ले रहा‌ अवशेष...
राग सुनाते भौंरों.....

उजड़ गया प्रेमिका की माँगें,
बस एक-टक चोंध रहा‌ हूँ...
ना‌ तन‌ से अब ढ़ाल बंढ़ि है,
अब‌‌ आकर प्यार बुंझाजा...
राग सुनाते भौंरें.....

ना ‌कोई‌‌ आया‌ सेवा लेने,
सब अपना राग गढ़ा है...
मैंने भी ख़ोजा सात समुंदर,
ना फिर भी किसी का प्यास बुझा है...
राग सुनाते भौंरें.....

 
          ✍️ विकास कुमार लाभ
                   मधुबनी(बिहार)