"थोड़ी मासुमियत थोड़ा सा अल्हड़पन
थोड़ा सा बचपना भी है मुझमें,
ज़िन्दगी की राह है संघर्ष भरी
हौसला और दृढ़ संकल्प है मन में भरा
दिल से सम्मान करती हूं सभी का
पर अपमान नहीं मैं सहती 
नारी हूं
दिल में बसा कर गैरों को भी,
सम्मान से जीना सिखलाती हूं
कमजोर पड़ जाती हूं अपनों के विश्वासघात से
नए संकल्प के साथ फिर से क़दम बढाती हूं
पहचान नहीं कर पाती इंसान की
इसलिए अक्सर छली भी जाती हूं
पर आभास होते ही खुद ही दूर हो जाती हूं।
नारी हूं।
बचपन की खट्टी मीठी यादों को दोहराती हूं
छोटी-छोटी बातों पर अक्सर उलझ जाती हूं
करती हूं तकरार बहुत कभी ज़िद पर भी अड़ जाती हूं
पर वक्त पड़ने पर उलझे रिश्ते को भी सुलझाती हूं।
नारी हूं।
सृजन करती हूं इसलिए रिश्ते सहेजती हूं
गलतियों को सुधारती हूं टूटने देती नहीं
बात आत्मसम्मान पर आए तो झुकती नहीं
संघर्ष पथ पर आगे बढ़ती हार मानती नहीं।
नारी हूं।।"
         अम्बिका झा ✍️