घनघोर कृष्ण निशा है
आपदाओं का काल है
रवि तो उदित होगा
तिमिर जा कहीं छिपेगा
मन में विश्वास
फिर क्यों उदास
क्यों करें रवि का इंतजार
इतनी सी रोशनी दीप की
मिटा देती तिमिर को
हौसलों का दीप जलाएं
घोर तिमिर को दूर भगायें
जुगुनू छुद्र कीट
इतनी सी रोशनी का वाहक
बन जाएं हम भी जुगुनू
निशा तो जायेगी अपने समय पर
रवि उदित भी होगा समय पर
तिमिर में नहीं रहना
इतनी सी रोशनी रख लो
निशा कट ही जायेगी
दीप आशा के
दीप सावधानी के
दीप परोपकार के
दीप कर्तव्य के
दीप हौसले के
दीप मानवता के
दीप सद्भाव के
दीप पुरुषार्थ के
दीप उत्साह के
दीप मेलजोल के
आओं मिल जलाएं
निशा का काल
इतनी इतनी रोशनी दीपों की
निशा निशा न रहेगी
दीप जलते रहें अविराम
तिमिर छिप ही जायेगा
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

1 टिप्पणियाँ