घर ,शहर बदलना रेवती की मजबूरी थी । कारण उसके पापा का तबादला हर तीसरे वर्ष हो जाया करता था और रेवती अपने माँ- पापा के साथ पैकिंग में जुट जाया करती थी।
आज भी कुछ ऐसा ही था ।रेवती आज फिर से एक नए शहर में आ गई थी । ऊँची -ऊँची इमारतों के बीच उनका भी एक फ्लैट था पाँचवी मंजिल पर ।सामानों को पाँचवी मंजिल पर ले जाना भी एक टास्क ही था पर पैकर्स ने बख़ूबी सारे सामानों को बिना किसी टूट - फुट के घर मे ला कर लगा दिया।एक कमरे में दसियों डब्बे पड़े थे।अधिकतर बचपन से ले कर आज तक कि किताबें थी या फिर कुछ छिटपुट सामान।
उन काटन्स को खोलने की सोच कर ही रेवती के सर में दर्द होने लगा।उसने सोचा चाय ही बना ली जाए और वह रसोईघर मे चली गई।चाय का पानी गैस पर रख माँ को आवाज़ लगाई ,माँ चाय पियेंगी क्या। माँ का जवाब हां में था सो दो कप चाय बना वह सीधे कमरे में आ गई ।एक कप खुद लिया और दोउसरी माँ को दे वहीं बैठ गई।
चाय की चुस्कियों के साथ काटन्स खुलने का सिलसिला चल पड़ा। एक -एक कर चीज़ें निकलने लगीं। बचपन से ले कर अब तक की किताबें ,नोट बुक्स , पेंटिंग बुक्स , प्रश्न पत्र और न जाने क्या - क्या। स्कूल ,कॉलेज के दिनों की चीजें जैसे रेवती का हाथ पकड़ उसे बीते दिनों में वापस ले गया।
इन्हीं किताबों के बीच मिली एक डायरी। रेवती झट उस डायरी को उठा कर देखने लगी। उसकी प्रिय डायरी।
नीले रंग की डायरी ,गोल्डन किनारों के साथ। हथेली से कवर साफ किया तो उसे अपना नाम साफ - साफ दिखाई देने लगा।रेवती ख़ुशी से पुलकित हो गई जैसे कोई खज़ाना मिल गया हो ।उत्सुकता से वह पन्ने पलटने लगी।
बात तब की है जब वह ग्रेजुएशन में थी। डायरी लिखना उसकी आदत न थी बस यूं ही खरीद लिया था और फिर रोजाना तो नहीं पर जब कभी कुछ अप्रत्याशित सा होता
तो उसे जरूर लिखती थी।लिहाजा कितने ही किस्से ,कितनी बातें ,कितने मज़ाक, कितना गुस्सा सब एक - एक कर उन पन्नो से निकलने लगे ।और ऐसे ही दो पन्नों के बीच मिला वो गुलाब।सुखी सी टहनी ,टूटे से कांटे और मुरझाई सी पंखुड़ियाँ।
बॉटनी की छात्रा थी सो पेड़ -पौधे ,फूल ,पत्ते ,कांटे ,टहनी सब से वास्ता था उसका ।किसी जड़ का ,किसी तने का या किसी फल या फूल का डिसेक्शन कर उसे माइक्रोस्कोप में देखना रेवती को अचंभे से भर देता था।पर शायद इस गुलाब की कहानी कुछ और थी।
फाइनल ईयर में पूरी क्लास को बोटैनिकल टूर पर ऊटी जाना हुआ दस दिनों के लिए ।दोस्तों के साथ बाहर का ट्रिप ,सभी को जैसे खजाना मिल गया।शहर तो घूम ही रही थी साथ ही बोटानिकल गार्डन के खूब चक्कर लग रहे थे।ऐसे ही एक सुबह प्रोफेसर दत्त तैयार हो निकल चुके थे और सारे स्टूडेंट्स भी।रेवती को थोड़ी देर हो गई सो वह भागते हुए टेबल से अपनी किताबें उठाने को गयी तो देखा उसकी डायरी पर एक गुलाब रखा है ।अभी सोचने का समय न था ,प्रोफेसर दत्त और सारे दोस्त रेवती रेवती चिल्ला रहे थे सो जल्दबाजी में पहले तो उसने उसे फेकने को उठाया पर फूल की सुंदरता और खुश्बू ने उसे ऐसा करने से रोक दिया तब रेवती ने झट से उसे डायरी के पन्नों के बीच रखा और चल पड़ी ।
दिनभर तो बस पढ़ाई की भागदौड़ रही पर शाम को उसने अपनी सहेलियों को बताया तो कई कयास लगने लगे।कई लडकों के नाम सामने आने लगे।सहेलियों को तो जैसे मज़ाक का बहाना मिल गया।पर रेवती ,वह तो सबसे पूछ रही थी कि ये गुलाब मेरी डायरी पर किसने रखा।वह पूछती रही पर किसी के तरफ से कोई जवाब न आया।खीझ कर रेवती ने कहा ,जब अपनी ही चीज को स्वीकारने में इतनी झिझक तो हमें भी जानने की उत्सुकता नहीं है। हां फूल सुंदर है सो फेंकने की इच्छा नही हो रही है इसे अपनी डायरी में रहने देती हूँ और उसने बड़ी सहजता से डायरी के पन्नो को बंद कर दिया।फिर तो समय जैसे पंख लगा कर उड़ने लगा।क्लासेस खत्म हुए ,फिर एग्जाम शुरू हो गए।और फिर वो समय आया जब कॉलेज छूट गया।सहेलियां छूट गईं ,उनके किस्से कहानियाँ सब छूट गए और काटन्स में बंद हो गईं सभी किताबें और डायरियाँ।
आज फिर से वही डायरी और वही गुलाब!!!
रेवती उस गुलाब को देखती रही।फिर से कुछ सवालों ने सिर उठाया।किसने उस गुलाब को रखा होगा?क्या वह किसी की बातों का सन्देशवाहक बना था? या फिर किसी ने अनजाने में ही उसे रेवती की डायरी पर रख दिया था?
एक बार फिर सारे कयास विफल रहे।विचारों को झटक उसने धीरे से डंठल को पकड़ उसे उठाना चाहा पर सारी पंखुड़ियाँ झड़ कर गिरने लगीं।
रेवती ने मुस्कुरा कर उन पंखुड़ियों को देखा।भले ही सुखी टहनी से गिर कर ये पंखुड़ियाँ बेजान हो गईं हों पर उसकी खुशबू उसके,सबसे प्यारे, सुखद दिनों कि यादों में एक प्रिय दोस्त के रूप हमेशा -हमेशा जीवित रहेगी।
मधुलिका सिन्हा
कोलकाता
पश्चिम बंगाल

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