न तुमने मुझे समझा,
न मैने तुम्हें समझा,
तुम छोड़ कर चले गए,
और पलट कर देखा भी नहीं,
कुछ तो कहा होता,
कुछ तो समझा होता,
कि तेरे बिना कैसे जियूंगी मैं,
एक बार भी नही सोचा,
जो मोहब्बत की आग दिल में भड़का कर गए थे,
वो बुझी है की नही,
एक बार वापिस आ जाओ,
एक बार फिर से जी लें हम,
कुछ तुम झुको, कुछ हम झुके,
और जो मोहब्बत की आग अब तक सीने में लगी है,
आज उसे बुझा ले हम,
एक बार फिर से जी लें हम।
हरप्रीत कौर
दिल्ली