मासूम हूं बहुत नाज़ुक भी हूं।
इम्तहान मत लेना,
सहनशीलता की मिसाल भी हूं।।

धधकती हुई क्रोध की ज्वाला
सती बन करती आत्म दाह, 
करती एक सवाल भी हूं।।

कभी अपमानित मत करना
सती बन कर करती यज्ञ विध्वंस।
सरस्वती बन शिक्षा देती,
तो मैं लक्ष्मी का अंश भी हूं।।

कभी टकराने की गुस्ताखी मत करना,
काली बन दुष्टों का करती संहार हूं।
अन्नपूर्णा बन भोजन देती,
मां बन कष्टों को हर करती प्यार भी हूं।।

कभी आजमाने की हिमाकत मत करना,
नवचंडी बन करती प्रहार।
मानवता का पाठ पढ़ाती,
भर्ती हूं संस्कार भी।।

अत्याचार कभी मत करना
वक्त पड़े तो महिषासुर को 
देती हूं ललकार भी।
प्रकृति बन उर्जा भरती,
और देती अन्न का उपहार भी।।

वक्त पड़े तो बनकर दूर्गा
आती हूं भक्तों के द्वार भी।
मैं नारी हूं, नर तेरे जीवन की आधार भी।।"
      अम्बिका झा ✍️