समाज में उसका सम्मान था।लेकिन दुख सुख जीवन के दो पहलू हैं।
वैश्विक युग में चीन ने अपने सस्ते माल से भारत के बाजार पर कब्जा कर लिया।
अब दीए,मूर्तियां,झालरें ,कंदील सब चीनी आने लगीं लोगों ने सस्ते होने की वजह से इसे अपनाना शुरू कर दिया।
भारतीय बाजार पर इसका दुष्प्रभाव साफ साफ दिखने लगा।
अब रामू की स्थिति दयनीय हो गई ,बड़ी मुश्किल से पेट भरने भर की कमाई होती। स्थानीय लोग ही फुटकर दीए ले जाते।
देश बदल रहा था,लेकिन रामू की हालत जस की तस थी।
वह हमेशा से सोचता ,मेरा हुनर मेरे बीबी ,बच्चों के मुंह में दो वक्त का निवाला भी नहीं दिला पा रहा,ऐसी जिंदगी का क्या लाभ।
कई बार वह सोचता क्यों न अपनी जिंदगी खत्म कर दूं,पर बच्चों और पत्नी का ख्याल आते पीछे हट जाता।
एक रात रामू आंगन में चारपाई पर लेटा लेटा तारों को निहार रहा था,आंख से नींद कोसों दूर थी।
उसके मन में अचानक एक मूर्ति बनाने का विचार आया।
वह उठा ,और मिट्टी लेकर अपनी कल्पना को मूर्त करने लगा।घर में सभी गहरी नींद में सो रहे थे।
रामू को ऐसा लग रहा था कि उसके हाथ किसी अदृश्य शक्ति से काम कर रहे हैं।
वह बनाता जा रहा था,रात भर की अथक मेहनत सुबह आकार ले चुकी थी।
एक बहुत सुंदर दुर्गा माता की प्रतिमा बन कर तैयार थी।ऐसा लग रहा था साक्षात माता ही प्रगट हो गई हैं और अभी ही माता बोल उठेंगी।
अनुपम,अद्वितीय,थी ये मूर्ति ।जो भी रामू के घर की तरफ से गुजरा वो अपलक निहारता रह गया।
धीरे धीरे उस अनूठी ,मूर्ति की खबर पूरे गांव में फैल गई।
भीड़ उमड़ आई ।लोग वीडियो बना बना कर अपलोड कर शेयर करने लगे।
संस्कृति विभाग के कर्मचारी ,नेता ,आम जन सब रामू के दरवाजे पहुंचे,उसकी सराहना की।
मुख्यमंत्री ने उसे शिल्प गुरु का सम्मान दिया,सम्मान के रूप में ,नगद राशि एक घर,और बहुत सारे काम उसे सरकार ने दिए ।
अब रामू के दिन फिर गए थे ,वो एक सम्मानित कलाकार हो चुका था।
सरकार ने उसे 50,000 दिए बनाने का भी ऑर्डर दिया जो गोमती ,सरयू और गंगा के घाटों पर दिवाली के दिन जलाए जाएंगे।
रामू पर मां लक्ष्मी और मां शक्ति की कृपा बरस रही थी।अब रामू अपने परिचय का मोहताज नहीं था ।उसका काम ही उसका परिचय था।
ये थी एक गुम कलाकार की दिवाली।
गोपाल दास नीरज की ये पंक्तियां
न फिर सूर्य रूठे,न फिर स्वप्न टूटे
उषा को जगाओ ,निशा को सुलाओ।
धरा को उठाओ,गगन को झुकाओ।
हर घर खुशहाल हो ,बच्चों के मुंह में खुशी के गीत हों ,अमीर गरीब के बीच की गहरी खाई न हो।
समाप्त

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