पुष्प वाटिका में गए, लक्ष्मण के संग राम।
पुष्प संग्रहित कर रहे, देखो खुद सुखधाम।।
आज जनकपुर की हुई, बड़ी सुहानी भोर।
कोयल कूके बाग में , नाच रहे हैं मोर।।
दर्शन के हित आ गए , देखो सब खग पास।
पुष्प वाटिका में खिला , एक नवल मधुमास।।
जनक दुलारी आ गईं , तब सखियों के संग।
स्वागत में करने लगे , कलरव सकल विहंग।।
लखन न लख पाए तनिक, लखन लगे श्रीराम।
सिय की शोभा देखकर , मुदित हुए सुखधाम।।
कंगन नूपुर बज रहे , पकड़े लय अरु ताल।
पुष्प वाटिका में मुदित , हो गए अवधभुआल।।
आज वाटिका में खिले , पुष्प कई तत्काल।
अनुपम जोड़ी के लिए , बन जाएं जयमाल।।
सीता प्रमुदित हो गईं , लख रघुवर को रूप।
पुष्प वाटिका में खिले , मन के पुष्प अनूप।।
गौरी पूजन कर रहीं , अधरों पर मुस्कान।
माला गौरी की गिरी , सिय अभिलाषा जान।।
पुष्प वाटिका में हुए , रावत चारों धाम।
रघुवर की सीता हुईं , अरु सीता के राम।।
रचनाकार
भरत सिंह रावत
भोपाल मध्यप्रदेश

2 टिप्पणियाँ