वो कागज की नैया, वो बारिश की नदियाँ! 
वो छोटी सी, जलधारा, बचपन खैवाईया"
वो सिक्को का अरमान, माटी में बोना "
कहाँ खो गया, वो बचपन का भैया!! 

कभी कंधे पर बैठा, नग्में सुनाता "
गोदी मे लेकर, लोरी सुनाता! 
वो खूटें मे, बंधी गोरी सी गईयां! 
कहाँ खो गया, वो बचपन का भैया!! 

वो बचपन के मेले, वो ऊंगली पकडना , 
बिछडने का डर, और आंखों का भरना, 
वो मासूम बातें, वो परवाह करना, 
कहाँ खो गया, वो बचपन का भैया!! 

वो दादा, दादी की लाठी पकडना "
सुबह शाम खेत खलिहान चलना! 
पिता जी की डांट, से मुस्कुराना, 
कहाँ खो गया वो, बचपन का भैया!! 

वो माँ का पीछे से,ऑचल पकडना, 
वो दीदी से हरपल लडना झगडना! 
हर हालात से बचकर, निकलना, 
कहाँ खो गया, वो बचपन का भैया!! 
श्रीमती रीमा महेंद्र ठाकुर "
राणापुर झाबुआ मध्यप्रदेश भारत