"अंजाना एहसास" को आगे बढ़ाते हुए....
वेदिका जो अपने अंतर्मन में उठ रहे अनजाने एहसास से मायूस तो थी, लेकिन उस एहसास से हारना नहीं चाहती थी। वह सब कुछ फिर ठीक कर देना चाहती थी, पता नहीं कैसे पर उस रिश्ते को खोने नहीं देना चाहती थी। उसके माता-पिता भी इस बात से काफी चिंतित थे। वे किसी भी तरह अपनी बेटी की खुशियां वापस लाना चाहते थे। उसके पिताजी ने मन ही मन प्रण लिया कि, वे फिर से एक कोशिश करेंगे और उसी परिवार में अपनी बेटी का विवाह कराएंगे। इसी विषय में विचार करके उन्होंने अपने खानदानी पंडित जी से बात की और कुंडलियों के मिलान दोबारा से अच्छे से करने को कहा। तभी एक दिन घर की सफाई करते समय पुराने दराज में वेदिका की मां को उसकी असली कुंडली मिली जो वेदिका के जन्म के समय बनवाई गई थी और बाद में दराज में रख दी गई। इसके बाद कभी उसकी जरूरत भी तो ना पड़ी,इसलिए यह पत्रिका इतने सालों से उसी दराज में रखी थी। अतः कुंडली मिल जाने पर वेदिका की माता जी काफी प्रसन्न चित्त थी। अब जब असली कुंडली मिल गई थी वेदिका के पिताजी उसको लेकर पंडित जी के पास गए और लड़के के पिता जी से भी बात की और कहा वह भी आ जाएं और दोनों कुंडलियों का मिलान करवा लें। पंडित जी ने दोबारा से कुंडलियों का मिलान करके अच्छे से विचार कर सभी गुणों का योग देखकर सब कुछ अच्छा होने की बात कही और बताया कि अब दोनों के विवाह में कोई विघ्न नहीं है। अतः आप सभी परिवारिक जन मिलकर सारी विधियां संपन्न कर सकते हैं। पंडित जी की बात मानकर दोनों के माता-पिता ने विवाह की तैयारी शुरू कर दी। सभी परिवारिक जन अति प्रसन्न थे और वेदिका तथा चिराग का विवाह सारे विधि विधान के साथ शांतिपूर्वक संपन्न हो गया जिससे वेदिका के माता-पिता भी काफी प्रसन्न हुए, कि उनकी कोशिश कामयाब हो गई और उनकी पुत्री एक सच्ची कोशिश के कारण सुखमय जीवन व्यतीत कर रही है।
भिलाई, छत्तीसगढ़

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