क्या कहूं बधाई पर
 सब की बधाई का अपना-अपना तराना
 सोच रही थी बधाई पर क्या लिखूं
 पर याद आया मुझको एक फसाना पुराना,
देते है सब बधाई, ज़ब भी मंगल कार्य हो कोई,
परन्तु ज़ब मैं छोटी थी,
सोचती थी तब तब ज़ब ज़ब किसी के घर कन्या हुई,
कि क्यों नहीं देते कन्या जनम पर बधाई,
जिसको देखो उसने नाक मुँह बनाई,
वैसे तो कहते है सब
हमारे घर लक्ष्मी है आई
किन्तु फिर भी क्यों वही लक्ष्मी किसी को ना भायी,
बालपन में पूछो अगर
क्या हुआ जो बेटी है आई,
तो सब यही कहकर चुप कराते,
अजी बेटियां होती है पराई,
समय बदला
दिन बदला बदली वार बदली परिस्थितियां,
अब नहीं कोई होता हताश
 बेटियों के जन्म पर दी जाती है बधाइयां,
 बजते हैं ढोल नगाड़े, बाँटी जाती हैं मिठाईयां
वर्तमान में हर क्षेत्र में
पहचान बना चुकी है बेटियां
जल, थल और नभ में
परचम अपना लहरा चुकी है बेटियां,
बेटे है कुल की पहचान तो
उसी कुल की शान है बेटियां
 बेटा बेटी है एक समान किन्तु,
कन्या भ्रूण हत्या को मात दे
जिन्होंने जनम दी है बेटियां
उनको दिल से बधाइयाँ...


निकेता पाहुजा
रुद्रपुर, उत्तराखंड