कुछ मुझमें अधूरा लगता है
सब सूना सूना लगता है
चाँद भी मद्धम लगता है
जब से गये हो तुम परदेस
खिले फूल देख मन मुरझाए
सजना सँवरना मुझे न भाए
दर्पण भी बैरी लगता हाय
जब से गये हो तुम परदेस
न उमंग तीज त्योहारों की
न ललक बसन्त बहारों की
न लुभाती रौनक बाजारों की
जब से गये हो तुम परदेस
तेरे दरस की मुझे आस है
कभीकभी लगता तू आसपास है
विरह से जागी,कैसी ये प्यास है
जब से गये हो तुम परदेस
हरपल भीगी सी रहती हैं
ये याद में बरसती रहती हैं
मेरी आँखें राह तेरी तकती हैं
जब से गये हो तुम परदेस
प्रीति ताम्रकार
जबलपुर

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