करीब होकर भी जिनको पाते नहीं कहीं
फ़ासले कितने भी हो हम मिटा सकते नहीं।
बेखबर चल पड़े जिस मुश्किल डगर पर
लाख चाहे तो भी वादा निभा सकते नहीं।
बेहतर की तलाश खत्म नहीं होती जहान में
हर बार आसमां के पार जा सकते नहीं।
राह -ए -ज़िन्दगी भटकी है कई मोड़ो पर
बिन संघर्ष निशां मंज़िल के पा सकते नहीं।
साये सुकून के मयस्सर हो जाये उन्हें भी
बेबस और लाचार मज़बूरी जता सकते नहीं।
गुलज़ार रख ख़्वाबों ख्यालों की महफ़िले
अरमानों के समंदर की थाह पा सकते नहीं।
ज़ब ये मुस्कान होठों की बंधी हो शर्तो में
खोज़े खुशियाँ तो कहीं भी पा सकते नहीं।
तिनका -तिनका सहेजते बिखर गये है जैसे
वो 'सपनों का घर' अब सजा सकते नहीं।
शैली भागवत 'आस'

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